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Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi महामंत्र लाभ, विधि

 सनातन धर्म में भगवान श्री हरि विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना गया है। जीवन के हर कष्ट, आर्थिक समस्या और मानसिक तनाव को दूर करने के लिए शास्त्रों में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ सबसे अचूक और प्रभावशाली उपाय बताया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में स्वयं भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर लेटे हुए युधिष्ठिर को भगवान विष्णु के इन 1000 नामों की महिमा बताई थी।

Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi महामंत्र लाभ, विधि



अगर आप भी भगवान नारायण की असीम कृपा पाना चाहते हैं और इंटरनेट पर vishnu sahasranamam lyrics in hindi खोज रहे हैं, तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं। आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपको विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र के पाठ की विधि, इसके अद्भुत लाभ और श्लोक सरल हिंदी में उपलब्ध करा रहे हैं।

विष्णु सहस्त्रनाम क्या है?

विष्णु सहस्त्रनाम का शाब्दिक अर्थ है - भगवान विष्णु के एक हज़ार नाम। यह पवित्र स्तोत्र महाभारत का एक अभिन्न अंग है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा कि संसार में सबसे बड़ा धर्म क्या है और किस देव की स्तुति से मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है? तब पितामह ने उत्तर में श्री हरि के इन 1000 नामों का उपदेश दिया था। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने भी इस स्तोत्र पर भाष्य (व्याख्या) लिखा है, जो इसकी महानता को और बढ़ा देता है।

विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने के अद्भुत लाभ

  1. मन की शांति और सकारात्मकता: इसके नियमित पाठ से मन के सभी विकार और नकारात्मक विचार नष्ट होते हैं। यह मानसिक शांति का सबसे बड़ा स्रोत है।

  2. ग्रह दोषों से मुक्ति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से कुंडली के कई अशुभ ग्रह दोष शांत होते हैं। विशेषकर गुरु (बृहस्पति) और बुध ग्रह की स्थिति मजबूत होती है।

  3. धन और समृद्धि का वास: मान्यता है कि जहां श्री हरि नारायण का वास होता है, वहां माता लक्ष्मी स्वयं पधारती हैं। इसके पाठ से दरिद्रता दूर होती है और घर में बरकत आती है।

  4. आरोग्य की प्राप्ति: इसके पवित्र श्लोकों की ध्वनि से एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो मानसिक तनाव और शारीरिक रोगों को दूर करने में सहायक है।

  5. सफलता और आत्मविश्वास: जो भी प्राणी भगवान विष्णु के इन नामों का स्मरण करता है, उसके आत्मविश्वास, विद्या, यश और बल में निरंतर वृद्धि होती है।

श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र पाठ (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi)

नीचे भगवान विष्णु के पवित्र 1000 नामों के स्तोत्र का ध्यान और प्रारंभिक श्लोक दिए गए हैं। पाठ शुरू करने से पहले मन को एकाग्र करें और श्री नारायण का ध्यान करें।

(ध्यानम्) शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

(स्तोत्रम्) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:

ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः । भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः ।। 1 ।।

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।

योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः । नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि: अव्ययः । संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु: ईश्वरः ।। 4 ।।

स्वयंभूः शम्भु: आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।। 5 ।।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।। 6 ।।

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं ।। 7।।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः ।। 8 ।।

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति: आत्मवान ।। 9 ।।

सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। 10 ।।

(यह स्तोत्र अत्यंत विस्तृत है और इसमें 108 श्लोकों के माध्यम से भगवान के 1000 नामों का वर्णन किया गया है। शुरुआत में आप इन प्रथम 10 श्लोकों का नियमित पाठ करके भी नारायण की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।)

विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ कैसे करें? (सही विधि)

विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने के लिए शास्त्रों में कोई बहुत कठोर नियम नहीं हैं, क्योंकि भगवान केवल भक्त का भाव देखते हैं। फिर भी, इन बातों का ध्यान रखने से पाठ अधिक फलदायी होता है:

  • सही समय: इसका पाठ सुबह स्नान के बाद या गोधूलि बेला (शाम के समय) में करना सबसे उत्तम माना जाता है। गुरुवार और एकादशी का दिन इसके लिए विशेष रूप से शुभ होता है।

  • स्वच्छता और आसन: पीले या साफ़ वस्त्र धारण करें। कुशा या ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

  • समर्पण भाव: भगवान की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण है आपका भाव। पूरी श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ vishnu sahasranamam lyrics in hindi को पढ़ें या सुनें।

  • दीपक और प्रसाद: पाठ के दौरान भगवान श्री हरि के समक्ष गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और तुलसी दल के साथ भोग अवश्य लगाएं।


श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र (सम्पूर्ण 108 श्लोक)

॥ हरिः ॐ ॥

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।

भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।

अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ 2 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।

नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।

सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।

अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।

विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6 ॥

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।

प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।

हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8 ॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।

अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ 9 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।

अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10 ॥

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।

वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिसृतः ॥ 11 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः ।

अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।

अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13 ॥

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।

वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ 14 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।

चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।

अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।

अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।

अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।

अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19 ॥

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।

अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।

हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥

अमृत्युः सर्वदृक्सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः ।

अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।

निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।

सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।

अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।

सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।

सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ 27 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।

वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।

नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।

ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।

औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।

कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।

अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।

क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।

अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।

वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ 36 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।

अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।

महर्द्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।

सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः ॥ 39 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।

महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।

करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।

परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥

रामो विरामो विरतो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।

वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ 43 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।

हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।

उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।

अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।

नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः ।

सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।

मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।

वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।

अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।

आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।

शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53 ॥

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।

विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्त्वतां पतिः ॥ 54 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।

अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ 55 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।

आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।

त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।

गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ 58 ॥

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।

वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59 ॥

भगवान्भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।

आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।

दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।

संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ 62 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।

गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।

श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ॥ 64 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।

श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।

विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ 66 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।

भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।

अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ 68 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।

त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।

अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ 70 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।

ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।

महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।

पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।

वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।

शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।

दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ 76 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।

अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77 ॥

एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।

लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।

वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।

सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80 ॥

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81 ॥

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।

चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82 ॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।

दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।

इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।

अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।

महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।

अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।

न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ 88 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।

अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।

अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90 ॥

भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।

आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।

अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः ॥ 92 ॥

सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।

अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥ 93 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।

रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।

अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।

स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।

शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।

विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।

वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99 ॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।

चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।

जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101 ॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।

ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।

तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103 ॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।

यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104 ॥

यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।

यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105 ॥

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।

देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।

रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107 ॥

सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।

श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ 108 ॥


श्री विष्णु के नाम और उनके अर्थ (1 से 108 तक)

नीचे दी गई तालिका में भगवान विष्णु के नाम और उनके अद्भुत अर्थ विस्तार से दिए गए हैं:


क्रमांकभगवान श्री विष्णु का नामहिंदी अनुवाद / अर्थ
1विश्वम् (Vishwam)जो स्वयं ही संपूर्ण ब्रह्मांड (जगत) हैं।
2विष्णुः (Vishnu)जो कण-कण में और हर जगह व्याप्त हैं।
3वषट्कारः (Vashatkara)जिनके लिए यज्ञ और आहुतियां दी जाती हैं।
4भूतभव्यभवत्प्रभुः (Bhutabhavya-bhavat-prabhu)जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों के स्वामी हैं।
5भूतकृत् (Bhutakrit)सभी प्राणियों और सृष्टि की रचना करने वाले।
6भूतभृत् (Bhutabhrit)सभी प्राणियों का पालन-पोषण करने वाले।
7भावः (Bhava)संपूर्ण जगत के अस्तित्व का मूल कारण।
8भूतात्मा (Bhutatma)संसार के सभी प्राणियों की आत्मा (परमात्मा)।
9भूतभावनः (Bhutabhavana)प्राणियों को उत्पन्न और विकसित करने वाले।
10पूतात्मा (Putatma)जिनकी आत्मा परम शुद्ध और पवित्र है।
11परमात्मा (Paramatma)जो सभी आत्माओं में सर्वोच्च हैं।
12मुक्तानां परमा गतिः (Muktanam Parama Gati)मुक्त (मोक्ष प्राप्त) जीवों की अंतिम मंजिल।
13अव्ययः (Avyaya)जिनका कभी विनाश नहीं होता (अविनाशी)।
14पुरुषः (Purusha)जो इस शरीर रूपी नगरी में निवास करते हैं।
15साक्षी (Sakshi)जो संसार के हर कर्म को बिना किसी स्वार्थ के देखते हैं।
16क्षेत्रज्ञः (Kshetrajna)जो शरीर (क्षेत्र) और उसमें होने वाले हर विकार को जानने वाले हैं।
17अक्षरः (Akshara)जो कभी नष्ट नहीं होते (अजर-अमर)।
18योगः (Yoga)जो योग के माध्यम से प्राप्त होते हैं।
19योगविदां नेता (Yogavidam Neta)जो योगियों और ज्ञानियों का मार्गदर्शन करते हैं।
20प्रधानपुरुषेश्वरः (Pradhanapurusheshwara)जो प्रकृति (प्रधान) और जीव (पुरुष) दोनों के स्वामी हैं।
21नारसिंहवपुः (Narasimhavapu)जिन्होंने नर और सिंह का मिला-जुला रूप धारण किया।
22श्रीमान् (Shriman)जिनके साथ हमेशा माता लक्ष्मी (श्री) का वास होता है।
23केशवः (Keshava)जिनके बाल सुंदर हैं, अथवा जो ब्रह्मा (क) और शिव (ईश) को भी वश में रखते हैं।
24पुरुषोत्तमः (Purushottama)जो सभी पुरुषों (जीवों) में सर्वोत्तम हैं।
25सर्वः (Sarva)जो स्वयं ही सबकुछ हैं (सर्वस्व)।
26शर्वः (Sharva)जो प्रलय के समय सबका संहार करते हैं।
27शिवः (Shiva)जो परम कल्याणकारी और शुद्ध हैं।
28स्थाणुः (Sthanu)जो पर्वत की तरह स्थिर और अचल हैं।
29भूतादिः (Bhutadi)जो सभी प्राणियों के मूल (शुरुआत) हैं।
30निधिरव्ययः (Nidhiravyaya)जो प्रलय के समय सभी जीवों के शरणस्थान (अविनाशी खजाना) हैं।
31सम्भवः (Sambhava)जो अपनी इच्छा से अवतार लेते हैं।
32भावनः (Bhavana)जो अपने भक्तों को सब कुछ प्रदान करते हैं।
33भर्ता (Bharta)जो पूरे ब्रह्मांड का भरण-पोषण करते हैं।
34प्रभवः (Prabhava)जिनसे पंचमहाभूतों और सृष्टि का जन्म होता है।
35प्रभुः (Prabhu)जो सर्वशक्तिमान और सभी कार्यों में समर्थ हैं।
36ईश्वरः (Ishwara)जो सभी शक्तियों के स्वामी हैं और बिना किसी बाधा के शासन करते हैं।
37स्वयम्भूः (Swayambhu)जो स्वयं प्रकट हुए हैं (जिनका कोई जन्मदाता नहीं)।
38शम्भुः (Shambhu)जो सुख और आनंद उत्पन्न करते हैं।
39आदित्यः (Aditya)जो अदिति के पुत्र (वामन अवतार) के रूप में जन्मे।
40पुष्कराक्षः (Pushkaraksha)जिनकी आंखें कमल के फूल के समान सुंदर हैं।
41महास्वनः (Mahaswana)जिनकी ध्वनि (वेद रूपी) महान है।
42अनादिनिधनः (Anadinidhana)जिनका न कोई आरंभ है और न ही कोई अंत।
43धाता (Dhata)जो सभी का धारण और समर्थन करते हैं।
44विधाता (Vidhata)जो कर्मों के अनुसार जीवों को फल देते हैं।
45धातुरुत्तमः (Dhaturuttama)जो सभी तत्वों (ब्रह्मा आदि) से भी उत्तम हैं।
46अप्रमेयः (Aprameya)जिन्हें इंद्रियों या तर्कों से नहीं मापा जा सकता।
47हृषीकेशः (Hrishikesha)जो सभी इंद्रियों के स्वामी हैं।
48पद्मनाभः (Padmanabha)जिनकी नाभि से ब्रह्मांड रूपी कमल उत्पन्न हुआ है।
49अमरप्रभुः (Amaraprabhu)जो अमर देवों (इंद्र आदि) के भी प्रभु हैं।
50विश्वकर्मा (Vishwakarma)जो संपूर्ण विश्व की रचना करने वाले हैं।
51मनुः (Manu)जो मननशील और ज्ञान के स्वरूप हैं।
52त्वष्टा (Tvashta)जो प्रलय के समय विशाल सृष्टि को सूक्ष्म कर देते हैं।
53स्थविष्ठः (Sthavishtha)जिनका आकार सबसे विशाल है।
54स्थविरः ध्रुवः (Sthaviro Dhruva)जो अत्यंत प्राचीन और हमेशा स्थिर रहने वाले हैं।
55अग्राह्यः (Agrahya)जिन्हें सामान्य बुद्धि या इंद्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता।
56शाश्वतः (Shashvata)जो सदा एक समान रहने वाले (नित्य) हैं।
57कृष्णः (Krishna)जो सच्चिदानंद स्वरूप हैं और सबको आकर्षित करते हैं।
58लोहिताक्षः (Lohitaksha)जिनकी आंखें लालिमा लिए हुए सुंदर हैं।
59प्रतर्दनः (Pratardana)जो प्रलय के समय सभी का नाश करने वाले हैं।
60प्रभूतः (Prabhuta)जो धन-धान्य और ज्ञान से पूर्ण हैं।
61त्रिककुब्धाम (Trikakubdhama)जो तीनों लोकों (ऊपर, नीचे, मध्य) के आश्रय हैं।
62पवित्रम् (Pavitram)जो परम शुद्ध हैं और सबको पवित्र करने वाले हैं।
63मंगलं परम् (Mangalam Param)जो सर्वोच्च शुभ और कल्याणकारी हैं।
64ईशानः (Ishana)जो सभी दिशाओं और लोकों पर शासन करते हैं।
65प्राणदः (Pranada)जो सभी जीवों को प्राण (जीवन) देने वाले हैं।
66प्राणः (Prana)जो स्वयं जीवन का स्वरूप हैं।
67ज्येष्ठः (Jyeshtha)जो सबसे बड़े और सबसे पुराने हैं।
68श्रेष्ठः (Shreshtha)जो गुणों में सबसे उत्तम हैं।
69प्रजापतिः (Prajapati)जो सभी प्रजा (जीवों) के परम पिता हैं।
70हिरण्यगर्भः (Hiranyagarbha)जो ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्मा के रूप में निवास करते हैं।
71भूगर्भः (Bhugarbha)जिनके गर्भ (उदर) में संपूर्ण पृथ्वी समाहित है।
72माधवः (Madhava)जो माता लक्ष्मी (मा) के पति (धव) हैं।
73मधुसूदनः (Madhusudana)जिन्होंने 'मधु' नामक राक्षस का वध किया था।
74ईश्वरः (Ishwara)जो सब कुछ करने में स्वतंत्र और समर्थ हैं।
75विक्रमी (Vikrami)जो अत्यंत पराक्रमी और शूरवीर हैं।
76धन्वी (Dhanvi)जो शांर्ग नामक दिव्य धनुष धारण करते हैं।
77मेधावी (Medhavi)जो असीमित बुद्धि और ज्ञान के स्वामी हैं।
78विक्रमः (Vikrama)जो गरुड़ पक्षी पर सवारी करते हैं (अथवा जिनका वामन अवतार में कदम महान था)।
79क्रमः (Krama)जो संपूर्ण जगत में विस्तार पाते हैं।
80अनुत्तमः (Anuttama)जिनसे उत्तम और श्रेष्ठ इस संसार में कोई नहीं है।
81दुराधर्षः (Duradharsha)जिन्हें किसी भी राक्षस या शत्रु द्वारा हराया नहीं जा सकता।
82कृतज्ञः (Kritajna)जो भक्तों द्वारा किए गए छोटे से अच्छे कार्य (जैसे पत्र, पुष्प अर्पण) को भी याद रखते हैं।
83कृतिः (Kriti)जो सभी शुभ कार्यों के फल और स्वरूप हैं।
84आत्मवान् (Atmavan)जो स्वयं अपनी महिमा में स्थित हैं।
85सुरेशः (Suresha)जो सभी देवों (सुरों) के भी स्वामी (ईश) हैं।
86शरणम् (Sharanam)जो दुखी और परेशान लोगों के लिए एकमात्र आश्रय हैं।
87शर्म (Sharma)जो स्वयं परम आनंद का स्वरूप हैं।
88विश्वरेताः (Vishvaretah)जो संपूर्ण विश्व के बीज (उत्पत्ति के कारण) हैं।
89प्रजाभवः (Prajabhava)जिनसे सभी जीवों की उत्पत्ति होती है।
90अहः (Ahah)जो प्रकाश के समान अज्ञान के अंधकार को दूर करते हैं।
91संवत्सरः (Samvatsara)जो समय और काल (वर्ष) के स्वरूप हैं।
92व्यालः (Vyala)जिन्हें पकड़ना या समझना अत्यंत कठिन है (सर्प के समान)।
93प्रत्ययः (Pratyaya)जो शुद्ध ज्ञान और विश्वास के स्वरूप हैं।
94सर्वदर्शनः (Sarvadarshana)जो सब कुछ देखने वाले हैं।
95अजः (Aja)जिनका कभी जन्म नहीं होता (अजन्मा)।
96सर्वेश्वरः (Sarveshwara)जो सभी ईश्वरों के परम ईश्वर हैं।
97सिद्धः (Siddha)जो हमेशा सिद्ध और पूर्ण रूप में स्थित हैं।
98सिद्धिः (Siddhi)जो सभी प्रकार की सफलताओं का स्वरूप हैं।
99सर्वादिः (Sarvadi)जो सभी वस्तुओं और जीवों की प्रथम शुरुआत हैं।
100अच्युतः (Achyuta)जो कभी अपने स्वरूप, स्थान और शक्ति से नहीं गिरते।
101वृषाकपिः (Vrishakapi)जो धर्म (वृष) के रक्षक और अधर्म को नष्ट करने वाले वराह अवतार हैं।
102अमेयात्मा (Ameyatma)जिनके विशाल स्वरूप और बुद्धि को मापा नहीं जा सकता।
103सर्वयोगविनिसृतः (Sarvayogavinisrita)जो सभी तरह के आसक्ति और बंधनों से पूरी तरह मुक्त हैं।
104वसुः (Vasu)जो सभी प्राणियों में वास करते हैं।
105वसुमनाः (Vasumanah)जिनका मन हमेशा शुद्ध और सभी के प्रति उदार रहता है।
106सत्यः (Satya)जो हमेशा सत्य और यथार्थ स्वरूप हैं।
107समात्मा (Samatma)जो सभी के प्रति समान भाव रखते हैं (जिनका कोई प्रिय या अप्रिय नहीं)।
108सम्मितः (Sammita)जो सभी तत्वज्ञानियों द्वारा भली-भांति समझे गए हैं।
क्रमांकभगवान श्री विष्णु का नामहिंदी अनुवाद / अर्थ
109समः (Samah)जो सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित हैं, जिनका कोई पक्षपात नहीं है।
110अमोघः (Amoghah)जिनकी उपासना और भक्ति कभी निष्फल (व्यर्थ) नहीं जाती।
111पुण्डरीकाक्षः (Pundarikakshah)जिनके नेत्र कमल के समान हैं और जो भक्तों के हृदय रूपी कमल में वास करते हैं।
112वृषकर्मा (Vrishakarma)जिनके सभी कार्य धर्म (वृष) के अनुसार और कल्याणकारी होते हैं।
113वृषाकृतिः (Vrishakritih)जो स्वयं धर्म का स्वरूप हैं।
114रुद्रः (Rudrah)जो दुष्टों को रुलाते हैं या अज्ञानियों का दुःख दूर करते हैं।
115बहुशिराः (Bahushirah)जिनके अनेक (अनंत) सिर हैं (विराट स्वरूप)।
116बभ्रुः (Babhruh)जो संपूर्ण लोकों और ब्रह्मांड का भरण-पोषण करते हैं।
117विश्वयोनिः (Vishvayonih)जो समस्त विश्व की उत्पत्ति के कारण (मूल स्रोत) हैं।
118शुचिश्रवाः (Shuchishravah)जिनके नाम, कीर्ति और कथाएं सुनने में परम पवित्र हैं।
119अमृतः (Amritah)जो जन्म-मृत्यु और बुढ़ापे से रहित (अमर) हैं।
120शाश्वतः स्थाणुः (Shashvata-sthanuh)जो सदा एकरस, अचल और स्थिर रहने वाले हैं।
121वरारोहः (Vararohah)जो मोक्ष रूपी परम गति प्रदान करने वाले हैं।
122महातपाः (Mahatapah)जिनका ज्ञान रूपी तप संसार में सबसे महान है।
123सर्वगः (Sarvagah)जो सब जगह (कण-कण में) व्याप्त हैं।
124सर्वविद्भानुः (Sarvavid-bhanuh)जो सब कुछ जानने वाले और सूर्य के समान प्रकाशमान हैं।
125विष्वक्सेनः (Vishvaksenah)जिनके सामने आते ही दैत्यों (बुराइयों) की सेनाएं तितर-बितर हो जाती हैं।
126जनार्दनः (Janardanah)जो दुष्टों का नाश करते हैं और भक्त जिनसे सुख व मोक्ष की याचना करते हैं।
127वेदः (Vedah)जो स्वयं वेद (ज्ञान) के स्वरूप हैं।
128वेदवित् (Vedavit)जो वेदों का सही अर्थ और रहस्य जानने वाले हैं।
129अव्यङ्गः (Avyangah)जिनमें कोई कमी या दोष नहीं है (जो सर्वथा परिपूर्ण हैं)।
130वेदाङ्गः (Vedangah)वेद (श्रुतियां) जिनके अंग हैं।
131वेदवित् (Vedavit)(पुनः) जो वेदों का विचार करने वाले और ज्ञाता हैं।
132कविः (Kavih)जो सब कुछ देखने वाले (सर्वदर्शी) और परम ज्ञानी हैं।
133लोकाध्यक्षः (Lokadhyakshah)जो संपूर्ण लोकों (तीनों लोकों) के अध्यक्ष या स्वामी हैं।
134सुराध्यक्षः (Suradhyakshah)जो सभी देवताओं (सुरों) के भी स्वामी और रक्षक हैं।
135धर्माध्यक्षः (Dharmadhyakshah)जो धर्म-अधर्म के निर्णायक और अध्यक्ष हैं।
136कृताकृतः (Kritakritah)जो कार्य (सृष्टि) और कारण दोनों रूप में विद्यमान हैं।
137चतुरात्मा (Chaturatma)जिनकी चार महान विभूतियां (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) हैं।
138चतुर्व्यूहः (Chaturvyuhah)जो चार रूपों में विभाजित होकर सृष्टि का संचालन करते हैं।
139चतुर्दंष्ट्रः (Chaturdamshtrah)जिनके (नृसिंह अवतार में) चार विशाल दांत हैं।
140चतुर्भुजः (Chaturbhujah)जिनकी चार भुजाएं (शंख, चक्र, गदा, पद्म धारी) हैं।
141भ्राजिष्णुः (Bhrajishnuh)जो स्वयं प्रकाशमान और अत्यंत तेजस्वी हैं।
142भोजनम् (Bhojanam)जो जीवों के लिए भोग्य (अमृत रूपी आनंद) हैं।
143भोक्ता (Bhokta)जो सभी यज्ञों, आहुतियों और भोगों को ग्रहण करने वाले हैं।
144सहिष्णुः (Sahishnuh)जो अत्यंत क्षमाशील हैं और भक्तों के अपराध सह लेते हैं।
145जगदादिजः (Jagadadijah)जो जगत की शुरुआत में सबसे पहले प्रकट हुए (हिरण्यगर्भ रूप में)।
146अनघः (Anaghah)जो हर प्रकार के पाप, दोष और दुःख से रहित हैं (पवित्र हैं)।
147विजयः (Vijayah)जो ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में सबसे श्रेष्ठ हैं (जो सदा विजयी हैं)।
148जेता (Jeta)जो अपने शत्रुओं और सम्पूर्ण चराचर जगत को जीतने वाले हैं।
149विश्वयोनिः (Vishvayonih)(पुनः) जो संपूर्ण विश्व के आदि कारण हैं।
150पुनर्वसुः (Punarvasuh)जो जीवों के रूप में बार-बार शरीरों में वास करते हैं।




निष्कर्ष (Conclusion)

कलियुग में भगवान के नाम का जप ही भवसागर से पार जाने का सबसे सरल और सटीक साधन है। भगवान श्री हरि विष्णु संपूर्ण जगत के आधार हैं। अगर आप समयाभाव के कारण नियमित रूप से पूरे स्तोत्र का पाठ नहीं कर पाते हैं, तो केवल इसके ऑडियो को सुनना या कुछ श्लोकों का नित्य पाठ करना भी आपके जीवन में चमत्कारिक बदलाव ला सकता है।

उम्मीद है कि एक ब्लॉगर और आध्यात्मिक प्रेमी के रूप में साझा की गई यह जानकारी आपके लिए उपयोगी साबित होगी। अब जब भी आपको vishnu sahasranamam lyrics in hindi का पाठ करना हो, तो इस विधि और भाव के साथ करें।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः!

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